Thursday, 1 December 2016

सुखद भविष्य की तैयारी-



क्या आपने भी सुखद भविष्य की तैयारी की हैं








                                                                                                         जैंसे आज की प्रथा हैं कि प्रेसिडेंट कुछ वर्षाे के लिए होते है। फिर नया चुनाव होता हैं । उसी तरह किसी एक देश में यह प्रथा थी कि हर साल में शासक बदले जाते थे। राजा बदल दिये जाते थे। जब राजा बदले जाते, तब पुराने राजा के सभी कपडे उतरावा लिये जाते थे और एक लंगोटी पहना दी जाती थी और बदन पर एक चादर डाल दिया जाता था। और उसे नौका में बेैठाकर उस पार जंगल में छोड दिया जाता था।

यहां इस जंगल कोइ बस्ती नहीं रहती थी। यह प्रथा चली आ रही थी। उस पार छोडे गये जो इस प्रकार के मनुष्य रहते थे, वे बेचारे दुख पा-पा कर के मर जाते। वे कष्ट उठाते थे न तो वहां कोई सामान रहता, न कोई खाने की चीज रहती, घोर जंगल था। यह बात सभी जानते थे साल भर के बाद यहां से चले जाना है। लेकिन कुछ करते कराते नही थे।

एक बार किसी को वह स्थान मिला। वह कुछ समझदार था। समझदार वह जो अपना अगला काम बना ले , जो भविष्य को देखे वह समझदार। उसने अधिकार मिलते ही मंत्रीयों और अन्य लोगों से पूछा कि हमारा कितने दिन का अधिकार है ? उसे बताया गया कि एक वर्ष का। उसने फिर पूछा कि सालभर में अधिकार की कोई सीमा है ? कोई सीमा नहीं है- यह उत्तर मिला। आप जो चाहें सो कर सकते हैं।

एक साल तक आपकी सारी बात पूरी की पूरी ज्यो कि त्यों मान ली जायेगीै। आप कुछ भी दे लें, कुछ भी करें, किसी को बसाये, किसी को उजाडे अपका पूरा अधिकार है। तब उसने अपने मन में निश्चय किया कि जब सालभर के बाद यहां से जाना ही हैं और वही जाना हैं तो जहां जाना हैं, उस स्थान का पता लगायें और पहले वहां की व्यवस्था करें।

यहां सालभर जो रहना हैं उसमें जो जिम्मेदारी के कार्य मिले हैं उनको निभाएंगे ईमानदारी के साथ। जितनी उपर की चीजे – नाच, मुजरा, तमाशा, अभिनन्दन, बंदगी, पार्टी, दावत, इन सब कामों में समय खोना ऐष आराम मे समय खोना, इंद्रियों के भोगों मे समय खोना तो मूर्खता है।

क्योंकि एक साल के बाद तो यह सारे समाप्त हो जायेंगे। उसने सभी फालतू कार्यों को जिनकी जरूरत जीवन में नही हैं, केवल आडंबर कौतुहल और भोग और लिप्सा को लेकर किये जाते हैं। उन सब कार्यों को बन्द करवा दिया।

लोग तो नये राजा हैं, उनसे कुछ लेना हैं, काम कराना हैं अपना स्वार्थ सिद्ध करना हैं – यह सोचकर आते ही हैं। उसके पास भी आये और बोले – हमने अमुख जगह बडा इंतजाम किया है, बडा सुंदर नाच होगा। सभी महाराजा वहां पधारते रहे हैं आपको भी पधारना चाहिए। उस राजा ने कहा- हमें अवकाश नही है। कुछ दिनों तक तो लोग आये, फिर सोचने लगे कि यह तो मनहूस आदमी है, यह कहीं आयेगा जायेगा नहीं इसे छोडो।

 स्ंसार का यही स्वरूप् है। हम दूसरों का नाम झुठे लेते हैं, हम अपने से ही फंसते चले जाते है। आप अगर अलग हो जाये और संसार वाले को दिख जाये कि इनसे अपना स्वार्थ नही सिद्ध होगा तो अपने आप सब छोड देंगे और सम्बन्ध रखेंगे तो भी उपर -उपर से । सभ्यता के नाते।

मां -बाप बुढे हो गये और लडके बडे शीलवान हैं फिर भी उनके पास समय नही हैं की उनके पास बैठे। वे निकम्मे नही हैं कामकाजी है। पिताजी माताजी के लिए नौकर रख देंगे । डाॅक्टर से कहलवा देंगे कि आकर देख जाया करो। दवा की व्यवस्था कर देंगे, लेकिन उनके पास बैठकर दिनभर उनकी बात सुने और वे बिच में दखल अंदाजी करें, हस्तक्षेप करें ऐसा नही होता वे पिताजी को समझा देंगे कि देखिए –

अब आप बुढे हो गये आप भगवान् का नाम लो आप पडे रहों, आपके पास आदमी हैं सेवा में कोई कमी नही है। हम लोग कामकाजी आदमी हैं हमारे पास कहां फूर्सत हैं कि आपके पास बैठें। आपकी दुनिया दूसरी हैं और आज की दूसरी है। आप बीच में बोल देते हैं और हमारा काम बिगड जाता है। आप चुपचाप रहा करें मतलब यह कि- उनसे कोई काम अपना नही है। निकम्मे आदमी से कोई काम नही। संसार में जब तक स्वार्थ हैं तब तक प्रेम है | याद रखना इस बात को |

जब तक स्वार्थ हैं तब तक तो प्रीति हैं, प्रेम हैं और जहां देखा कि इससे स्वार्थ नही सधता, तब उपेक्षा हैं जहां स्वार्थ में किसी तरह की अडचन आने लगे तो द्वेष हैं। जब लोगों ने देखा कि राजा साहब तो कुछ काम करते कराते नहीं हैं तो क्यों व्यर्थ में आयें खुशामद करे।

इसलिए लोगो ने आना छोड दिया। उन्होंने सोचा बड़ा अच्छा हुआ, पिंड छूटा लोग ज्यादा सताते अब अपने आप सब काम निपट गया। अब वह अपना राजकाज देखने लगे और यह आदेश दे दिया कि नदी के उस पार का सारा जंगल आबाद करवाया जाये। नगर के नगर वहां बसे। और यहां का सामान वहां भेजा जाये। ग्यारह माह पूरे होने तक वहां सारी व्यवस्था हो जाये और वहां का सारा कार्य पूर्ण हो जाये।

यह राजाज्ञा थी, सामान की कमी थी नहीं और इसी बात पर शासन का पूरा जोर था। नदी के उस पार का पूरा जंगल आबाद हो गया, यहां से अच्छी-अच्छी चीजे वहां गयी। अब सालभर पूरा होते ही इनके कपडे उतरवाये गये और चादर दे दिया गया। कहां गया कि नावं में बैठो तो वे नांव में बैठो तो वे नांव में बैठ गये।

नांव चली तो यह राजा हंसते हुए चले। उनसे पूछा गया कि तुमसे पहले के राजा तो सब रोते हुए गये थे, आप हंसते हुए क्यो जा रहे हैं ? उसने कहा- सभी यहां हंस रहे थे इसलिए रोते हुए गये, मैंने यहां हसंना छोड दिया इसलिए हंसते हुए जा रहे है। यहां राग करते, ममता करते, हंसते तो हम भी खाली हाथ रोते हुए जाते।

लेकिन हमने अपना आगे का सारा काम कर लिया। जहां जाना हैं वहां हमारे लिए यहा से अधिक सुख मौंजुद है। यह दृष्ठान्त दिया महात्मा चरणदासजी ने अपने ग्रन्थ में कहने का मतलब यह हैं कि हमारी जो उम्र हैं, यह बिलकुल नपी तुली है। प्रत्येक श्वास का हिसाब है। कि इतने श्वास आएंगे। और जहां श्वास पूरे हुए फिर उसके बाद जाना ही है।

डाॅक्टर की कैपेसिटी नही कि एक हस्ताक्षर तक करने योग्य बना दे। इसलिए जो कुछ भी करना हैं उसे अभी कर लें और जो करने के लिए ही यह मानव जीवन मिला हैं उसे सबसे पहले करना है। यहां के लिए तैयार रहें, तैयार रहने का अर्थ यही हैं कि मन कही अटके भटके नही और आगे के लिए तैयार रहे।  

आगे के लिए तैयारी यही करनी हैं कि भगवान में हमारा मन लगा रहे। भगवान हमें ले जाने के लिए प्रस्तुत रहे। यह तो आगे की तैयारी है। इसके लिए करना हैं कि यहां कोई ममता आसक्ती न रह जायें। जो कुछ भी यहां का बंधन हैं वह ममता और आसक्ति का बंध न है। यह मेरा हैं – यह ममता है। ममता ही बांधती हैं |

इसलिए जगत के प्राणी, पदार्थों और परिस्थिति मे न रहे सब छुटेगा। यह निश्चित बात है। और ऐसा छुटेगा कि हम उससे सबंध नही रख सकेंगे । फिर चाहे आप भुत प्रेत होकर भटके रोयें चिल्लाएं | मैंने प्रेत आत्माओं से बात-चित की हैं, उनसे मैंने ज्ञात की हैं यह सारी स्थितियां |

प्रेत लोक मेें यहां की वासनाओं को लेकर यहां की ममतओं को लेकर यहां की आसक्ति को लेकर, यहां के वैर विरोध केा लेकर बडा कष्ट होता है। इसलिए यंहां का खाता चुकता करके जाना चाहिए। यहां का खाता अर्थात राग-द्वेष, ममता का खाता यहां चुकता हो जाये तब तो बडी आसानी से आगे शक्ति मिलती है।

नही तो महाराज इतना भयानक कष्ट मिलता हैं कि असहाय होता है। और वहां जीव निरूपाय होता है। कुछ कर पाता नही है। और उसका मन रातदिन जलता रहता है। प्रेत योनी जो निम्न कोटी के प्रेत होते हैं उनको नरक यात्रा तो भोगनी ही पडती हैं उसके अतिरिक्त उनका मानस क्लेष इतना भयानक होता हैं कि जिसे वे किसी प्रकार से मिटा नही सकते। यहां मिटा सकते है। मनुष्य कर्म स्वतंत्र हैं लेकिन प्रेत नही। वहां तो ऐसी बुरी दशा होती हैं कि जिसका कोई ठिकाना नही।

इसलिए ठीक ऐसी राजा की तरह आप भी अपने जीवन काल को बिना व्यर्थ गवाये आगे के जीवन के लिए लगाए, ध्यान करें, साधन करें, तपस्या करें | सांसारिक मोह माया में न फंसे नहीं तो ठीक और राजाओ की तरह आप भी जीवन के अंत में रोते हुए विदा होंगे | फैसला आपके ही हाथ में हैं |


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यह भी बीत जायेगा--This Time Will Also Pass



This Time Will Also Pass

यह भी बीत जायेगा।

 


एक बडी प्रसिद्ध सुफी कहानी है। एक सम्राट ने अपने सारे बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा – मैं कुछ ऐसे सुत्र चाहता हूं, जो छोटा हो, बडे शास्त्र नहीं चाहिए, मुझे फुर्सत भी नहीं बडे शास्त्र पढने की। वह ऐसा सुत्र हो जो एक वचन में पूरा हो जाये और जो हर घडी में काम आये। दूख हो या सुख, जीत हो या हार, जीवन हो या मृत्यु सब में काम आये, तो तुम लोग ऐसा सुत्र खोज लाओ।

उन बुद्धिमानों ने बडी मेहनत की, बडा विवाद किया कुछ निष्कर्ष नहीं हो सका। वे आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा- हम बडी मुश्किल में पडे हैं बड़ा विवाद है, संघर्ष है , कोई निष्कर्ष नहीं हो पाय, हमने सुना हैं एक सूफी फकीर गांव के बाहर ठहरा है वह प्रज्ञा को उपलब्ध संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति है, क्यों न हम उसी के  पास चलें ?

वे लोग उस सुफी फकीर के पास पहूंचे उसने एक अंगुठी पहन रखी थी अपनी अंगुली में वह निकालकर सम्राट को दे दी और कहा – इसे पहन लो। इस पत्थर के नीचे एक छोटा सा कागज रखा है, उसमें सुत्र लिखा है, वह मेरे गुरू ने मुझे दिया था, मुझे तो जरूरत भी न पडी इसलिए मैंने अभी तक खोलकर देखा भी नहीं ।

 उन्होंने एक शर्त रखी थी कि जब कुछ उपाय न रह जायें, सब तरफ से निरूपाय हो जाओं, तब इसे खोलकर पढना, ऐसी कोई घडी न आयी उनकी बडी कृपा है इसलिए मैंने इसे खोलकर पढा नहीं, लेकिन इसमें जरूर कुछ राज होगा आप रख लो। लेकिन शर्त याद रखना इसका वचन दे दो कि जब कोई उपाय न रह जायेगा सब तरफ से निरूपाय असहाय हो जाओंगे तभी अंतिम घडी में इसे खोलना।

क्योंकि यह सुत्र बडा बहुमूल्य है अगर इसे साधारणतः खोला गया तो अर्थहीन होगा। सम्राट ने अंगुठी पहन ली, वर्षो बीत गये कई बार जिज्ञासा भी हुई फिर सोचा कि कही खराब न हो जाए, फिर काफी वर्षो बाद एक युद्ध हुआ जिसमें सम्राट हार गया, और दुश्मन जीत गया। उसके राज्य को हडप लिया |

वह सम्राट एक घोडे पर सवार होकर भागा अपनी जान बचाने के लिए राज्य तो गया संघी साथी, दोस्त, परिवार सब छुट गये, दो-चार सैनिक और रक्षक उसके साथ थे वे भी धीरे-धीरे हट गये क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं था तो रक्षा करने का भी कोई सवाल न था।

दुष्मन उस सम्राट का पीछा कर रहा था, तो सम्राट एक पहाडी घाटी से होकर भागा जा रहा था। उसके पीछे घोडों की आवाजें आ रही थी टापे सुनाई दे रही थी। प्राण संकट में थे, अचानक उसने पाया कि रास्ता समाप्त हो गया, आगे तो भयंकर गडा है वह लौट भी नही सकता था, एक पल के लिए सम्राट स्तब्ध खडा रह गया कि क्या करें ?

फिर अचानक याद आयी, खोली अंगुठी पत्थर हटाया निकाला कागज उसमें एक छोटा सा वचन लिखा था यह भी बीत जायेगा। सुत्र पढते ही उस सम्राट के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी उसके चेहरे पर एक बात का खयाल आया सब तो बीत गया, में सम्राट न रहा, मेरा साम्राज्य गया, सुख बीत गया, जब सुख बीत जाता है तो दुख भी स्थिर नहीं हो सकता।

शायद सुत्र ठीक कहता हैं अब करने को कुछ भी नहीं हैं लेकिन सुत्र ने उसके भीतर कोई सोया तार छेंड दिया। कोई साज छेड दिया। यह भी बीत जायेगा ऐसा बोध होते ही जैसे सपना टुट गया। अब वह व्यग्र नहीं, बैचेन नहीं, घबराया हुआ नहीं था। वह बैठ गया।

संयोग की बात थी, थोडी देर तक तो घोडे की टांप सुनायी देती रहीं फिर टांप बंद हो गयी, शायद सैनिक किसी दूसरे रास्ते पर मूड गये। घना जंगल और बिहड पहाड उन्हें पता नहीं चला कि सम्राट किस तरफ गया है। धीरे-धीरे घोडो की टांप दूर हो गयी, अंगुठी उसने वापस पहन ली।

कुछ दिनों बार दोबारा उसने अपने मित्रों को वापस इकठ्ठा कर लिया, फिर उसने वापस अपने दुष्मन पर हमला किया, पुनः जीत हासिल की फिर अपने सिंहासन पर बैठ गया। जब सम्राट अपने सिंहासन पर बैठा तो बडा आनंदित हो रहा था।

तभी उसे फिर पुनः उस अंगुठी की याद आयी उसने अंगुठी खोली कागज को पढा फिर मुस्कुराया दोबारा सारा आनन्द विजयी का उल्लास, विजयी का दंभ सब विदा हो गया। उसके वजीरों ने पूछा- आप बडे प्रसन्न् थे अब एक दम शांत हो गये क्या हुआ ?

सम्राट ने कहा- जब सभी बीत जायेगा तो इस संसार में न तो दूखी होने को कुछ हैं और न ही सुखी  होने को कुछ है। तो जो चीज तुम्हें लगती हैं कि बीत जायेगी उसे याद रखना, अगर यह सुत्र पकड में आ जाये, तो और क्या चाहिए ? तुम्हारी पकड ढीली होने लगेगी। तुम धीरे-धीरे अपने को उन सब चीजों से दूर पाने लगोेगे जो चीजें बीत जायेगी क्या अकडना, कैसा गर्व, किस बात के लिए इठलाना, सब बीत जायेगा। यह जवानी बीत जायेगी |

याद बन-बन के कहानी लौटी, सांस हो-हो के विरानी लौटी
लौटे सब गम जो दिये दुनिया ने, मगर न जाकर जवानी लौटी।


 यह सब बीत जायेगा। यह जवानी, यह दो दिन की इठलाहट, यह दो दिन के लिए तितलियों जैसे पंख यह सब बीत जायेगे। यह दो दिन की चहल-पहल फिर गहरा सन्नाटा, फिर मरघट की शान्ति |